गुरू का कथन कि वह व्यक्ति न ही ब्रम्हसे बिक्षुडता है और ना ही
ब्रम्ह उस व्यक्ति को विस्मृत करता है व्यापकता का ज्ञोतक है । व्यक्ति अपने आत्म
अनुभूति को जितना ही अपना गहन अनुभव बनाता है उतना ही वह प्रत्येक रूप में ब्रम्ह
की अनुभूति से ओतप्रोत हो जाता है । व्यक्ति जितना ही अपने को प्रकृति के मोंह से
काट अपने को ब्रम्ह के ध्यान में केंद्रित करता है उतना ही उसके विचार व्यापक हो
जाते हैं ।
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