प्रथम चरण में आत्म अनुभूति का होना पुन: आत्मा में ब्रम्ह स्वरूप
का बोध होना । इन भावो के प्रतिफल से उसे प्रत्येक स्वरूप में ब्रम्ह के विद्यमान
होने का अनुभव होने लगता है । ऐसी दशा प्राप्त होने पर व्यक्ति प्रत्येक के प्रति
आदर भाव से युक्त हो जाता है विनम्र हो जाता है । उसकी इच्छायें क्षीण हो जाती है
इसलिये वह सुख और दु:ख की अनुभूति से मुक्त हो जाता है ।
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