इंद्रीय ज्ञान अथवा मानसिक विश्लेषण द्वारा जो अनुभव व्यक्ति
ग्रहण करता है की तुलना यदि उस अनुभव से की जाय जिसे कंचिद व्यक्ति के मस्तिष्क को
समस्त ज्ञात लोक से अलग कर दिया जाय और वह मस्तिष्क केंद्रित प्रयत्नों से यह
अनुभूति ग्रहण करे कि हमारे शरीर में संचरित हो रही समस्त गति विधियों को उर्जा
कहाँ से प्राप्त हो रही है तो यह निष्कर्श निकलेगा कि पूर्व में वर्णित अनुभव
परिवर्तनशील हैं जबकि उत्तरार्ध में वर्णित अनुभव नित्य है । सही और उचित का
निर्णय जब हमारे नित्य/सत्य अनुभव पर आधारित होगा तो हम
परम् सत्य के साथ एकीकृत अनुभव करेंगे
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