गुरू द्वारा बताये गये दीपक के ज्योति लौ के उदाहरण को स्पष्ट
करते हुये व्याख्याकार कहता है कि मस्तिष्क में ब्रम्हचेतना की ज्योति निर्विघ्न
बिना विचलन के दीप्तमान रहना चाहिये । ऐसी स्थिति होने पर पीछे छूटा हुआ मोंह पुन:
अवसर पाकर मस्तिष्क को आच्छादित नहीं कर सकेगा ।
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