ब्रम्ह व्यापक दिव्य स्वत:अस्तित्व है । उसने अपने को अपनी माया
शक्ति द्वारा संसार के समस्त रूपों में विस्तृत किया है । प्रत्येक रूप में
विद्यमान उसकी ही उच्चतर प्रकृति आत्मा का यह दायित्व है कि वह अपने उद्गम के मूल
ब्रम्ह को जाने, उसकी मर्यादा के अनुकूल आचरण करे, अपने को उस ब्रम्ह के प्रतिनिधि के रूप में
प्रस्तुत करे । योग यही लक्ष्य प्राप्त करने का पथ है । इसी योग को व्यवारिक जीवन
में चरितार्थ करने के लिये समस्त विस्तार भगवद्गीता के ग्रंथकार ने इस ध्यानयोग
नामक छठे अध्याय में गुरू योगेशवर श्रीकृष्ण के उपदेश के माध्यम से प्रस्तुत किया है । यह अध्याय पूर्ण हुआ ।
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