गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि व्यक्ति के पूर्व
के जन्म के योग के अभ्यास के बल से नये जन्म में प्रयत्न प्रारम्भ करने पर
प्रयत्नकाल में ही उसे ब्रम्ह का अनुभव वेद द्वारा व्यक्त ब्रम्ह के ज्ञान से अधिक
ही हो जाता है जो कि अभ्यास की पूर्णता पर इतना शक्तिशाली हो जाता है कि उस
व्यक्ति को पुन: मोंह व्याप्त होता ही नहीं है ।
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