गुरू द्वारा योग के सम्बंध में उसके समस्त पहलुओं के उपदेश का
सार यह है कि प्रत्येक रूप में विद्यमान आत्मा और उस रूप की प्रकृति के मध्य
नियंत्रित परस्पर को स्थापित करना तथा यह सुनिश्चित करना कि इस परस्पर में आत्मा
अपने मौलिक स्वरूप में सतत् आचरण करे । यही जो कर सके वह योगी है । ब्रम्ह की ही
उच्चतर प्रकृति आत्मा है । ब्रम्ह की ही निम्नतर प्रकृति रूप की प्रकृति है । माया
भी ब्रम्ह के ही विज्ञान की शक्ति है । यह समस्त व्यूह ब्रम्ह की लीला है । उनकी
कृपा द्वारा ही कुछ भी सम्भव हो सकेगा ।
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