शनिवार, 21 नवंबर 2015

भक्तयोगी की व्याख्या

वह योगी जो भक्तिपूर्वक ब्रम्ह को समर्पित रहता है उसे गुरू द्वारा सबसे प्रिय बताने का अभिप्राय यह बनता है कि योग की सकल साधना ब्रम्ह की कृपा के अधीन ही होती है । माया इतनी प्रबल शक्तिशाली होती है कि इसे कोई काट नहीं पाता है । इसलिये मुक्त आत्मा की स्थिति शीघ्र बनती नहीं है । इस सब उपलब्धि के लिये ब्रम्ह की कृपा का अवलम्ब अनिवार्य होता है ।    

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