गुरू जिज्ञासु अर्जुन को आत्मा का सत्य स्वरूप तथा इस सत्य
स्वरूप का संसार की रचना के साथ कारणयुक्त सम्बंध बताने का लक्ष्य करते हैं । किसी
भी ज्ञान के जिज्ञासु के हृदय में मस्तिष्क में मात्र सत्य के निर्विकार, निरंकार, निरंजन स्वरूप से पूर्ण संतोष नहीं मिलता है इसीलिये गुरू उस
सत्य का संसार के रूपों के साथ कारण्युक्त सम्बंध भी बताने को कहे ।
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