प्रकृतीय मोंह का जीवन यापन करते हुये मस्तिष्क का आम अभ्यास बन
जाता है कि वह अपनी इच्छा की पूर्ति को लक्षित कर उपलब्ध सम्भावनाओं में से हल
खोजता है । इस प्रक्रिया द्वारा मस्तिष्क अपनी अशांति और उद्विग्नता स्वयं आमंत्रित
करता है । गुरू इसका सरल निदान बताये कि मोंह को त्याग दो समस्त मानसिक चंचलता
शांत हो जावेगी ।
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