भगवद्गीता
सोमवार, 9 अक्टूबर 2017
सुनिश्चित अंतिम
यज्ञ
,
दान और तप के कर्मों के विषय में आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से बताये कि परंतु इन कर्मों को भी आसक्ति को और फलों की इच्छा को त्यागकर ही करना चाहिये । हे पार्थ (अर्जुन) यह मेरा सुनिश्चित और अंतिम मत है ।
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