गुरू के उपदेश में
एक मात्र कर्ता शब्द के प्रयोग को आदिशंकर स्पष्ट करते हुये बताये कि “विशुद्ध
आत्मा को कर्ता समझता है ।” यदि इसे अभिव्यक्ति का भावार्थ माना जाय तो निश्चय ही
वह तथ्य को नहीं समझता है परंतु सामान्यतया जीव को कर्ता समझा जाता है, तो वह
मानवीय कर्म के मुख्य निर्धारकों में से, जो सबके सब प्रकृति
के उपज है केवल एक है ।
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