सोमवार, 23 अक्टूबर 2017

एकमात्र कर्ता

गुरू के उपदेश में एक मात्र कर्ता शब्द के प्रयोग को आदिशंकर स्पष्ट करते हुये बताये कि “विशुद्ध आत्मा को कर्ता समझता है ।” यदि इसे अभिव्यक्ति का भावार्थ माना जाय तो निश्चय ही वह तथ्य को नहीं समझता है परंतु सामान्यतया जीव को कर्ता समझा जाता है, तो वह मानवीय कर्म के मुख्य निर्धारकों में से, जो सबके सब प्रकृति के उपज है केवल एक है । 

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