कर्म सिद्धांत के
अनुसार प्रत्येक कर्म से कर्मफल सृजित होता है । पूर्व के जन्मों के संचित कर्मफलो
को भोगने हेतु वर्तमान शरीर होती है । इसलिये व्यक्ति को ऐसी परिस्थितियों का भी
सामना करना पडता है जिसका औचित्य उस व्यक्ति के वर्तमान जन्म के कर्मों से नहीं
जुडता है । ऐसे स्थितियों को भाग्य कहकर समाधान किया जाता है । इसी को गुरू ने
दैवम् शब्द द्वारा व्यक्त किया है ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें