शुक्रवार, 20 अक्टूबर 2017

दैवम्

कर्म सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक कर्म से कर्मफल सृजित होता है । पूर्व के जन्मों के संचित कर्मफलो को भोगने हेतु वर्तमान शरीर होती है । इसलिये व्यक्ति को ऐसी परिस्थितियों का भी सामना करना पडता है जिसका औचित्य उस व्यक्ति के वर्तमान जन्म के कर्मों से नहीं जुडता है । ऐसे स्थितियों को भाग्य कहकर समाधान किया जाता है । इसी को गुरू ने दैवम् शब्द द्वारा व्यक्त किया है ।

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