ब्रम्ह ने अपने को अपनी प्रकृति द्वारा सृजित रूपों में प्रगट
किया है । कोई व्यक्ति सत्य ब्रम्ह के स्थान पर उसके प्रकृति निर्मित रूप में ही
अपनी निष्ठा पिरोता है, वह भी कुछ पाने के लिये तो
प्रत्युत्तर में ब्रम्ह उस व्यक्ति की इस निष्ठा का भी मूल्याँकन करता है । उस
व्यक्ति की इच्छा की पूर्ति कर उसे कुछ देता है । परंतु यह आस्था उस सत्य के प्रति
नहीं है बल्कि उसकी प्रकृति के प्रति है ।
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