गुरू ने अर्जुन को साँख्य बताया पुन: योग बताया । परंतु मनुष्य
की मानसिकता ऐसी होती है कि वह किसी भी ज्ञान को ग्रहण करने से पूर्व उसका विस्तार
और विश्लेषण जानना चाहता है । गुरू अर्जुन को रूप संसार के सृजन का विज्ञान उसके
मस्तिष्क की इसी जिज्ञासा की पूर्ति के उद्देष्य से ही बताये । ब्रम्ह एक सत्य है
। शेस संसार उसी सत्य का मात्र अभिव्यक्ति है । मनुष्य ब्रम्ह की प्रकृति का सृजित
रूप है । इस मनुष्य के जीवन का स्वरूप यदि कंचिद ब्रम्ह की उच्चतर प्रकृति आत्मा
के प्रधानता के अनुरूप हो तो वह अपेक्षाकृत ब्रम्ह की निम्नतर प्रकृति के प्रधानता
के जीवन स्वरूप से उत्कृष्ठ होगा । उत्पत्ति यदि अपने उद्गम श्रोत के प्रति
निष्ठावन होगी, समर्पित होगी तो फलत: वह श्रेष्ठतर
होगी ।
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