ब्रम्ह को किसी रूप द्वारा निरूपित नहीं किया जा सकता है । यह
हमारी कमज़ोरी है कि हम उस परम् सत्य का ध्यान नही कर पाते है और अपनी इस कमज़ोरी का
निराकरण करते हैं कि किसी रूप में हम ब्रम्ह की कल्पना को पिरोते हैं । हम जिस भी
रूप को ब्रम्ह का नाम देकर पूजते हैं वह मात्र हमारी कल्पना है सत्य नहीं है ।
ब्रम्ह तो प्रत्येक परिवर्तित होते रूप के परोक्ष में एक अपरिवर्तनीय सत्य है ।
उसका कोई रूप नहीं है । वह तो एकमात्र अरूपधारी सत्य है जो कि समस्त परिवर्तनों का
मात्र दृष्टा है ।
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