रूप सृजन करने की क्षमता माया है । यह माया जब प्रकृति के तीनो
गुणों से मुक्त होकर कार्य करती है तो इसे योगमाया कहा जाता है । यह एक विद्वान का
मत है । दूसरे विद्वान का मत है कि माया जब इच्छा के साथ युक्त होकर कार्य करती है
तो यह योगमाया है । ब्रम्ह मात्र रूप संसार तक ही सीमित सत्य नहीं है । वह इस
संसार से परे भी है । इसलिये उसे इस संसार के किसी रूप विषेस में सीमित कल्पना
करना अर्थविहीन है ।
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