पाप कृत कोई संविधान के उलंघन जैसा कृत नहीं होता है, बल्कि अविद्या के प्रभाव से अहंकार की
भावना से युक्त प्रकृतीय मोंहके अधीन स्वार्थपूर्ण इच्छाओं की पूर्ति के लिये किये
जाने वाले कर्म पाप की श्रेणी में आते हैं । गुरू बताये कि इस प्रकार पाप कृतों से
मुक्त व्यक्ति जिसको कि स्वाभाविक प्रतिफल के रूप में द्वैतों के त्रास से मुक्ति
मिल गई होगी वही व्यक्ति ब्रम्ह को केंद्रित ध्यान से उपासना करेगा ।
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