गुरू का कथन इस बात पर बल देता है कि जिस समय व्यक्ति के
एकाग्रता का अंतरण होता है उस समय उसके मस्तिष्क की एकाग्रता ब्रम्ह को उन्मुख
होनी चाहिये । इसका अभिप्राय इस प्रकार है कि मोंहके विषयों का अंतरण नहीं
वाँक्षित है बल्कि मोंह का त्याग वाँक्षित होता है । इस त्याग के साथ एकाग्रता का
अंतरण ब्रम्ह को उन्मुख होना अपेक्षित होता है ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें