व्याख्याकार गुरू द्वारा ब्रम्ह के स्वरूप के सम्बंध में उपदेश को स्पष्ट करते
हुये बताता है कि ब्रम्ह एक है उससा कोई दूसरा नहीं है । दूसरा व्याख्याकार कहता
है कि ब्रम्ह की अभिव्यक्ति के स्वरूप को भी ब्रम्ह का स्वरूप ही माना जाय । तीसरा
व्याख्याकार कहता है कि ब्रम्ह तो एकही है परंतु विशिष्ट प्रयोजन यथा धारणा स्थिर
करने के लिये उसकी अभिव्यक्ति को भी ब्रम्ह स्वरूप माना जाय ।
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