शनिवार, 21 मई 2016

साक्षी भी

ब्रम्ह के रहस्य को और आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से कहे कि ज्ञान के जिज्ञासु संतों का मैं ही लक्ष्य भी हूँ, मैं ही उन संतों में निहित लक्ष्य पाने की जिज्ञासा भी हूँ, मैं ही उनके द्वारा किये जा रहे प्रयत्नों का स्वामी भी हूँ, मैं ही उनके द्वारा किये जा रहे प्रयत्नों का साक्षी भी हूँ, ऐसे संत अपने प्रयत्नो की सफलता के लिये मेरा ही शरण भी ग्रहण करते हैं, मैं ही उनके प्रयत्नो में उनका मित्र भी हूँ, मैं ही समस्त उत्पत्ति का मूल भी हूँ और अंत में सबका विलय भी मुझमें ही होता है । 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें