गुरू ने बताया कि वेदों की उपासना पद्धति सुख-भोग की कामना से
देवपूजा करने वालों के लिये उपयोगी है जबकि ब्रम्ह को पाने का प्रयत्न करने वाले
ज्ञान के जिज्ञासुओं की उपासना ब्रम्ह की दिव्य शांति को पाने के लिये होती है । गुरू
वेदों में वर्णित उपासना पद्धति और आत्मा प्रधान जीवन के पथ से ब्रम्ह की उपासना
पद्धति की तुलनात्मक वृतांत बताकर अज्ञानी जिज्ञासु अर्जुन के मस्तिष्क में
व्याप्त संकल्प विकल्प की स्थिति को एक निर्णय तक पहुँचाने का प्रयत्न किये हैं ।
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