इस क्षणभँगुर रूप संसार का जीव जब, उदय होते रूपों एवं मृत्यु को प्राप्त होते जीवों की, उत्पत्ति के श्रोत तथा मरणोंपरांत गंतव्य
का चिंतन करता है तो उसे प्रतीत होता है कि कोई एक अविनाशी अस्तित्व है जो कि इन
समस्त परिवर्तनो से परे अविनाशी अस्तित्व है जो कि किसी भी परिवर्तन से प्रभावित
नहीं होता है । गुरू का उपदेश उसी अपरिवर्तनीय सत्य अस्तित्व का रहस्य बताते हुये व्यक्त
करता है कि इस रूप संसार का उदय से लेकर
विलय पर्यंत सभी कुछ उसी ब्रम्ह द्वारा ही सम्भव हो रहा है ।
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