यह मोहिनी प्रकृति जीव को अपने आकर्षण में ढगती है । ईंद्रीय
वासनाओं के पथ से यह जीव को अपने मोंह में आसक्त करती है । गुरू का उपदेश है कि इस
पथभ्रम से बचने के लिये व्यक्ति को जागृत विवेक की आवश्यकता होती है । विवेक जो कि
सत्य ब्रम्ह की मर्यादा एवं मोहिनी प्रकृति का भ्रम दोनो को स्पष्ट विभेद से अलग
अलग देखता रहे और उचित मर्यादित पथ पर व्यक्ति को चलाता रहे ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें