बुधवार, 4 मई 2016

पथभ्रम

यह मोहिनी प्रकृति जीव को अपने आकर्षण में ढगती है । ईंद्रीय वासनाओं के पथ से यह जीव को अपने मोंह में आसक्त करती है । गुरू का उपदेश है कि इस पथभ्रम से बचने के लिये व्यक्ति को जागृत विवेक की आवश्यकता होती है । विवेक जो कि सत्य ब्रम्ह की मर्यादा एवं मोहिनी प्रकृति का भ्रम दोनो को स्पष्ट विभेद से अलग अलग देखता रहे और उचित मर्यादित पथ पर व्यक्ति को चलाता रहे । 

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