ज्ञान प्राप्ति के जिज्ञासु अपने प्रयत्नों की सफलता के लिये
ब्रम्ह की शरण ग्रहण करते हैं । प्रयत्नशील जिज्ञासु माया के वशीभूत प्रयत्नकाल
में बार बार मोंह के पाश में लौट कर फँस जाते हैं, तो इस दशा से उबरने के लिये जब उन्हे अपने आंतरिक शक्ति पर
भरोसा नहीं रह जाता तो वह ब्रम्ह की शरण ग्रहण करते हैं । यदि जिज्ञासु की निष्ठा
सत्य हुई तो ब्रम्ह एक मित्र की भाँति उनकी मदद भी करता है । ब्रम्ह आदि, मध्य, अवसान सभी है । जिज्ञासु ब्रम्ह के सम्मुख जिसभी रूप में
उपस्थित होता है वह उसी रूप में ब्रम्ह को पाता है ।
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