गुरू ने ब्रम्ह के स्वरूप रहस्य को बताते हुये कहा कि समस्त रूप
संसार मेरे में निहित है । इस कथन की अंतर्निहित व्यापकता को व्यक्त करते हुये व्याख्याकार
कहता है कि उपासक को सदैव सम्मुख दीखने वाला व्यापक ब्रम्ह है । उपासक जिसभी दिशा
से उसे पूजता है वह ब्रम्ह उसके सम्मुख रहकर उसकी पूजा को ग्रहण करता है ।
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