शनिवार, 28 मई 2016

ताप तथा वर्षा

ब्रम्ह इस रूपधारी परंतु विनाशशील सृष्टि का मूल है । गुरू ने बताया कि ब्रम्ह से ताप पुन: ताप से वर्षा पुन: वर्षा से अन्न पुन: अन्न से जीव की उत्पत्ति है । एक समय अवधि तक जीव और रूप प्रगट रहने के बाद पुन: शून्य दशा है । यह शून्य दशा भी ब्रम्ह है । इस प्रकार यह चक्र ब्रम्ह से ही प्रारम्भ होकर ब्रम्ह में ही समाहित हो जाता है । यह रहस्य ब्रम्ह का स्वरूप है |  

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