गुरू द्वारा उपदेशित ब्रम्ह के रहस्य से यह विदित होता है कि इस
रूप संसार में ब्रम्ह की प्रकृति ही ब्रम्ह की महिमा से समस्त रूपों में विस्तरित
है । इन समस्त विस्तरित रूपों के लिये उभयनिष्ठ लक्ष्य यह होता है कि उस ब्रम्ह
में ही विलय की स्थिति तक पहुँच सकें । इसी लक्ष्य की प्राप्ति का पथ भाँति-भाँति
से प्रगट किये हैं । इस यज्ञ कर्म में यज्ञ ब्रम्ह है, कर्ता ब्रम्ह है,
आहुति ब्रम्ह है, ग्रहणकर्ता अग्नि ब्रम्ह है । यह
रूप चित्र धारण करना ही ब्रम्ह को जानना है ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें