गुरू ने पहले बताया कि पुण्यात्मा संत अपने पावन ज्ञान को
ब्रम्ह को आहुति कर पूजते हैं । पुन: इस आहुति कर्म और यज्ञ में प्रयुक्त समस्त
विस्तार में अपने को बताया । इस प्रकार की अभिव्यक्ति में गुरू का भाव यह है कि
हमारा सम्पूर्ण प्रकृति निर्मित अस्तित्व ब्रम्ह से है, हमें ब्रम्ह से मिला है, हम इसे पूर्ण रूप से ब्रम्ह को ही अर्पित करते हैं ।
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