एक आम प्रकृतीय मोंह से ग्रस्त
गृहस्थ का सामन्य जीवन यही होता है कि व्यक्ति किसी नयी वस्तु अथवा स्थिति को
देखता है तो उसकी यथा क्षवि से उसे आसक्ति/मोंह जनित होता है, तत्फलम् वह व्यक्ति उस वस्तु अथवा स्थिति
को पाने के लिये उद्यत होता है । इसी कामना से अर्जुन गुरू से ब्रम्ह के दिव्य
स्वरूप के दर्शन की प्रार्थना करता है । तर्क के आधार पर ऐसा कहा जा सकता है कि
अर्जुन को ब्रम्ह और उसके विज्ञान के विषय में श्रवण द्वारा मिले ज्ञान से उसे उस
ज्ञान को पाने को उद्यत होने का पर्याप्त उत्साह सृजित नहीं हो रहा है इसलिये वह
उस दिव्यरूप को दृष्टि से देखकर ही उसे पाने को उद्यत होना चाहता है ।
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