गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण द्वारा
प्रगट किये गये दिव्यरूप का दर्शन कर अर्जुन अत्यंत विस्मयपूर्ण चकित स्थिति में
अपने दोनो हाथों को प्रणाम करने की मुद्रा में जोडे हुये गुरू से अपनी अंत:करण की
दशा को व्यक्त करने का प्रयत्न करता है । ऐसा करने में उसके शरीर के रोम रोम रोमांच
से खडे हुये स्थिति में हैं ।
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