अर्जुन द्वारा ब्रम्ह के दिव्य रूप
के दर्शन की व्यक्त अभिलाषा – ब्रम्हस्वरूप गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण द्वारा
अनुग्रहपूर्वक जिज्ञासु अर्जुन को दिव्य दर्शन कराने की व्यक्त अनुकम्पा – यह
समस्त निश्चयही आँखों से देखे जानी वाली स्थिति का वृतांत नहीं है – अपितु यह
समस्त मनुष्य के मस्तिष्क की विश्लेषणात्मक क्षमता द्वारा ब्रम्ह के उस अद्भुद
विज्ञान को ग्राह्य करने का वृतांत है जिसके द्वारा ब्रम्ह ने अपने को इस रूप
संसार के असंख्य रूपों के रूप में प्रगट किया है – यह सृजित रूप संसार अपने रूप
में स्थिर है – और समयांतर से उसी ब्रम्ह में विलीन हो जावेगा । यह क्षमता निश्चय
ही मनुष्य अपनी सीमित क्षमता द्वारा अर्जित नहीं कर सकता है । इसे पाने के लिये ब्रम्हस्वरूप
गुरू की विशेस अनुग्रहात्मक अनुकम्पा द्वारा ही अर्जित कर सकता है । इस क्षमता के
जागृत हो जाने पर वह भूत,
वर्तमान और अभविष्य को
एकीकृत एक वर्तमान में देख सकेगा । यह आँखों की दृश्य क्षमता नहीं है अपितु
मस्तिष्क में धारणाओं को स्थापित करने की विशिष्ट क्षमता है जो कि ब्रम्हस्वरूप
गुरू की अनुकम्पा द्वारा ही मिल सकती है ।
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