श्रीमद्भागवद्गीता में गुरू के
उपदेश आदि से अंत पर्यंत यही प्रशस्थ करते हैं कि उस एकल सत्य परम् ब्रम्ह की
धारणा जिज्ञासु स्वयं अपनी अनुभूति पर आधारित धारण करे । वही अनुभूति सत्य ज्ञान
होगा । गुरू के इसी सुझाव को आत्मसात् करके जिज्ञासु अर्जुन गुरू के अबतक के उपदेश
से इतना संतुष्ट हो गया है कि उस परम् सत्य की अनुभूति पाने के लिये उसे आत्मा
प्रधान जीवन अपनाना होगा । वह गुरू से विनम्र भाव से विनय करता है कि प्रभु मुझे
आत्मा प्रधान जीवन के पथ से चलते हुये उस परम् सत्य की अनुभूति पर्यंत यात्रा का
दर्शन कराये प्रभू मैं आपका अनन्य अनुयायी हूँ ।
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