ज्ञान के जिज्ञासु अर्जुन का अब तक
का जीवन यापन एक आम गृहस्थ का था । अब गुरू के उपदेश के प्रभाव से यह पता चला कि
आत्मा प्रधान जीवन पथ अपनाने से ही उसे सत्य ब्रम्ह का ज्ञान मिल सकेगा । इस आत्मा
प्रधान जीवन को पाने के लिये उसे प्रकृतीय मोंह को त्यागना होगा । प्रकृतीय मोंह
उसे प्रिय लग रहा है । प्रश्न उठता है उस प्रिय को त्यागे कैसे ? इसलिये उसका मस्तिष्क उसके सम्मुख यह पहला
तर्क प्रस्तुत करता है कि जिस लक्ष्य को पाने के लिये अपने जन्म के साथी मोंह को
त्यागने का विचार कर रहे हो, कम से कम उस सत्य को आँखों से देख
तो लो । इस मानसिक तर्क की पुष्टि के लिये उसने दर्शन का विनय किया ।
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