भगवद्गीता में वर्णित गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण द्वारा जिज्ञासु अर्जुन को कराये गये दिव्य रूप के दर्शन के सदृष्य अन्य
दृष्टांत अन्य धर्मों में भी वर्णित हैं । यह वह अनुभूति है जो कि ज्ञान का
जिज्ञासु इस रूप संसार के समस्त रूपों में उस परम् सत्य की उपस्थिति को स्वयं अपने
अनुभव के आधार पर अनुभव करता है । दार्शनिक ज़ेसूज़ को भी इसी प्रकार का सत्य के
दर्शन का वृतांत वर्णित है । संत हिल्देगई के प्रकरण में भी इस प्रकार के वृतांत
वर्णित हैं ।
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