मंगलवार, 24 जनवरी 2017

दृष्य की समीक्षा

श्रीमद् भागवद्गीता के ग्रंथकार द्वारा गुरू के दिव्य अकथनीय रूप का वृतांत प्रस्तुत करने के प्रयत्न में यह स्पष्ट विदित होता है कि ग्रंथकार के अनुभव को व्यक्त करने में शब्दों का आभाव महसूस हुआ है । यह स्वाभाविक भी है । यथा अनेक मुख तथा आँखों से युक्त – द्वारा ग्रंथकार व्यक्त करना चाहता है कि सभी को खाजाने वाला तथा सभी को देखने वाला । अकथनीय अनुभव को व्यक्त करना दुष्कर प्रयत्न है । 

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