श्रीमद् भागवद्गीता के ग्रंथकार
द्वारा गुरू के दिव्य अकथनीय रूप का वृतांत प्रस्तुत करने के प्रयत्न में यह
स्पष्ट विदित होता है कि ग्रंथकार के अनुभव को व्यक्त करने में शब्दों का आभाव
महसूस हुआ है । यह स्वाभाविक भी है । यथा अनेक मुख तथा आँखों से युक्त – द्वारा
ग्रंथकार व्यक्त करना चाहता है कि सभी को खाजाने वाला तथा सभी को देखने वाला ।
अकथनीय अनुभव को व्यक्त करना दुष्कर प्रयत्न है ।
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