अर्जुन ज्ञानका जिज्ञासु है ।
सिद्धांत रूप में श्रवण के माध्यम से यह जानना कि इस रूप संसार के प्रत्येक रूप का
सृजन उस एकल सत्य ब्रम्ह द्वारा ही हुआ है और यह समस्त रूप समय के साथ विनाशशील है
तथा इनका विलय भी उसी सत्य ब्रम्ह में ही होगा, यह एक स्थिति है,
इसके विपरीत इस स्थिति को द्र्ष्य माध्यम से देखकर जानना, दोनो में बहुत अंतर होगा । जिज्ञासु अर्जुन को श्रवण द्वारा तो
सभी स्थिति जानने को मिली परंतु उसे इतने से संतोष नहीं हो रहा था । इसलिये वह
गुरू से ज्ञान को दृश्य माध्यम से आग्रह करता है । यद्यपि कि एक जिज्ञासु की
जिज्ञासा के रूप में अर्जुन की यह अभिलाषा स्वाभाविक कही जावेगी परंतु एक भक्त का
अपने ईष्ट से यह आग्रह निष्चय ही अशिष्ट आचरण माना जावेगा ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें