ज्ञान के जिज्ञासु अर्जुन द्वारा
व्यक्त दिव्य रूप के दर्शन की अभिलाषा से द्रवित होकर गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण
अनुग्रह पूर्वक अर्जुन से कहे कि हे पार्थ तुम मेरे दिव्य रूप का दर्शन करो मेरे
रूप जो सौ गुणा हज़ार गुणा विविध रूपों और रंगों में विस्तृत फैला हुआ हैं ।
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