त्रिगुणातीत के स्वरूप को आगे बताते
हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण बोले त्रिगुणातीत व्यक्ति गुणों से नि:स्पर्ष रहते
हुये, गुणों से विचलित ना होते हुये बैठा
रहता है, वह यह समझता है, कि केवल गुण ही समस्त कार्म कर रहे हैं, अप्रभावित स्थिति में कर्म से अप्रभावित
रहता है ।
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