गुरू के उपदेश में “ममैवांश” शब्द
का प्रयोग ग्रंथकार ने किया है जिसका शाब्दिक अर्थ होगा “मेरा ही अंश” परंतु कंचिद
ब्रम्ह विभाज्य सत्ता नहीं है । इस अभिव्यक्ति का अभिप्राय बनता है कि आत्मा वह
केंद्र है जो कि विकसित स्वरूप में समस्त संसार का अधिपति है । आत्मा व्यक्त
स्वरूप में भले ही एक सीमित शरीर में निहित है परंतु इसकी वास्तविक क्षमता उस
अखण्ड दिव्य ब्रम्ह स्वरूप है ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें