भगवद्गीता के ग्रंथकार ने
“देहसमुद्भवान” शब्द का प्रयोग किया है । “सत्व, रज़स्,
तमस् गुणों के वीर्य
में शरीर को जन्म मिला है” इस शब्द मे स्वयं धारित है । आदिशंकर इसका भावार्थ
बताते हैं कि सत्व को भी अपनी पूर्ण स्थापना के लिये अपने विरोधी रज़स् और तमस् से
संघर्ष करना पडता है । सत्व की पूर्ण स्थापना के उपरांत उसका भी त्याग करके
व्यक्ति गुणातीत स्थिति को प्राप्त होता है । यह कथन इस दृष्टांत के सदृष्य है कि
एक काटाँ को निकालेने के लिये दूसरे काँटे का प्रयोग किया जाता है । काँटा निकल
जाने पर दोनो ही काँटे को फेंक दिया जाता है ।
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