शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

देहसमुद्भवान

भगवद्गीता के ग्रंथकार ने “देहसमुद्भवान” शब्द का प्रयोग किया है । “सत्व, रज़स्, तमस् गुणों के वीर्य में शरीर को जन्म मिला है” इस शब्द मे स्वयं धारित है । आदिशंकर इसका भावार्थ बताते हैं कि सत्व को भी अपनी पूर्ण स्थापना के लिये अपने विरोधी रज़स् और तमस् से संघर्ष करना पडता है । सत्व की पूर्ण स्थापना के उपरांत उसका भी त्याग करके व्यक्ति गुणातीत स्थिति को प्राप्त होता है । यह कथन इस दृष्टांत के सदृष्य है कि एक काटाँ को निकालेने के लिये दूसरे काँटे का प्रयोग किया जाता है । काँटा निकल जाने पर दोनो ही काँटे को फेंक दिया जाता है । 

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