मंगलवार, 11 जुलाई 2017

द्वैतों से अप्रभावित

त्रिगुणातीत के स्वरूप को आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण बोले त्रिगुणातीत व्यक्ति सुख और पीडा को एक भाव से ग्रहण करता है, वह अपनी आत्मा में लीन दशा में रहता है, वह मिट्टी के टुकडे एक पत्थर के टुकडे और एक सोने के टुकडे को एक सम व्यवहृत करता है, वह मनोनुकूल स्थितियों को तथा मन के विपरीत स्थितियों को सम भाव से स्वीकार करता है, वह दृढ मस्तिष्क का होता है, वह लाक्षँन एव प्रशंसा को एक रूप में ग्रहण करता है ।

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