गुरू ने उपदेश किया कि “मैं अक्षर
और अनश्वर ब्रम्ह के, शाश्वत् धर्म और परम् आनंद का
निवास स्थान हूँ” । आदिशंकर गुरू के उपरोक्त कथन का वैकल्पिक अर्थ व्यक्त करते
हुये बताये, ब्रम्ह वैयक्ति ईश्वर के रूप में
“मैं जो कि असीमित और अनिर्वचनीय हूँ,
उस वैयक्तिक ईश्वर का निवास स्थान हूँ, जो कि अमर और अविभाज्य है” ।
इस प्रकार “तीनो गुणों के विभेद का
योग” नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें