अभिव्यक्ति “ममैवांशे” के सम्बंध
में महान विद्वान आदिशंकर बताये कि यह अभिव्यक्ति “घटाकाश” सदृष्य है । घडे के
स्वरूप में आकाश बँधा प्रतीत होता है परंतु वास्तविकता में घडे के स्वरूप से आकाश
सीमित नहीं होता है । यह मात्र सीमित की अनुभूति होती है । महान विद्वान रामानुज
का बताना है कि आत्मा वास्तव में ब्रम्ह का अंश है जो कि सीमित शरीर में रहकर
इंद्रीय वासनाओं की पूर्ति के कर्मों में संलग्न होकर सांसारिक सुख दु:ख का भोग
करता है ।
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