गुरू द्वारा वर्ण
के अनुसार कर्मो की विभक्ति का उपदेश किये गये हैं । यह निश्चय है कि इस
अभिव्यक्ति का अभिप्राय जन्म के कुल से नहीं है । यह विभाजन व्यक्ति के स्वभाव से
है, उसकी सहज रूचि से
है, उसकी अपनी सहज
कर्म के प्रति प्रवृत्ति से है । इस ज्ञान द्वारा व्यक्ति स्वयं यह निर्धारण कर
सके कि उसकी क्षमता का सर्वाधिक विकास किस क्षेत्र में हो सकता है, स्वाभाविक है कि
यह क्षेत्र उसकी अपने रूझान का होने पर ही होगा ।
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