गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो कर्ता मनोभावों से प्रभावित होता है, जो कर्मफल के
लिये उत्सुक रहता है, जो लालची होता है, जो क्षतिपूर्ण वृत्ति का होता है, अपवित्र होता है, जो हर्ष और विषाद
से विचलित होता है, उसे राजसिक कर्ता कहा जाता है ।
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