भगवद्गीता
गुरुवार, 16 नवंबर 2017
सात्विक सुख
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो सुख प्रारम्भ में विष के समान लगता है और अंत में अमृत के समान लगता है
,
जिसकी उत्पत्ति आत्मबोध के शाश्वत ज्ञान से होती है उसे सात्विक सुख कहा जाता है ।
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