गुरू के उपदेश में
बताये सात्विक कर्म और राजसिक कर्म में मौलिक भेद कर्म को करने में कर्म के कारण
से सृजित होता है । कारण यदि सद्भाव से सृजित हुआ है तो कर्ता व्यक्ति की कर्म
करने की मानसिकता में उत्साह, निष्ठा एवं सुखांभूति का समंवय रहेगा । कारण यदि इच्छापूर्ति
अथवा अहंकार की तुष्टि से सृजित है तो कर्ता व्यक्ति की मानसिकता राग, द्वेष और स्पर्धा
से ओतप्रोत रहेगी ।
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