बुधवार, 8 नवंबर 2017

तीक्ष्ण-विवेक

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण बोले, हे पार्थ (अर्जुन), कि जो बुद्धि कर्म और अकर्म को समझती है, जो करने योग्य कार्य और न करने योग्य कार्य को समझती है, जो इस बात को समझती है कि किससे डरना चाहिये और किससे नहीं डरना चाहिये, क्या आत्मा को बंधन में डालता है और क्या उसे मुक्त करता है वह बुद्धि सात्विक होती है । 

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