कर्म को करते हुये
पूर्णता प्राप्त करने के सम्बन्ध में गुरु ने जो उपदेश किये हैं उसमें गुरु ने अपनी
अभिव्यक्ति को “स्वे स्वे कर्मणि अभिरत:” द्वारा व्यक्त किया है, जिसका शाब्दिक
अर्थ है “अपने अपने काम में निष्ठापूर्वक लगा हुआ” । उपरोक्त की व्याख्या है –
प्रत्येक व्यक्ति को अपनी अनुभूतियों और मनोवेगों के प्रति निष्ठावन होना चाहिये, स्वभाव के स्तर
से ऊपर का कार्य करने की चेष्टा खतरनाक है । हमें अपने स्वभाव की शक्ति के अंदर
रहते हुये पूर्णतया अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिये ।
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